प्रोग्रामिंग सीखना ठीक वैसा ही है जैसे किसी गेम को सीखना।

यहां मैं शतरंज का उदाहरण लूंगा। मान लेते हैं आपको शतरंज सीखना है तो आप कौन सा तरीका अपनायेंगें?, दो तरीके हैं-

पहला तरीका – आप शतरंज के सभी नियमों को खूब अच्छी तरह से याद कर लीजिये। रोज सुबह-शाम नियमों को अच्छी तरह दोहरा लीजिये। उन नियमों को लिख कर देखिये, कहीं कोई कमी तो नहीं रह गई। जिस दिन आपको लगे कि आप को सभी नियम अच्छे से कंठस्थ हो गये हैं, कर दीजिये अपने शतरंज गुरु होने की घोषणा, लगा लीजिये किसी से भी दो-चार हज़ार रु. की शर्त शतरंज की बाजी की। चलिये अभी ज्यादा खुश मत हो जाइए, दूसरा तरीका पढिए।

दूसरा तरीका – नियमों को पढने के बाद शतरंज को खेलने बैठ जाइए। जब आप खेलेंगें तब आपको पता लगेगा कि सभी नियमों के पता होने के बाद भी आपको बहुत कुछ सीखना बाकी है, और जो बाकी है वो आपको सिखाया नहीं जा सकता वो आपको खुद ही सीखना होगा। शतरंज का गुरु कहलाने के लिये आपको यह खेल बार-२ कई बार खेलना होगा।

प्रोग्रामिंग सीखना भी ठीक शतरंज सीखने के जैसा ही है। प्रोग्रामिंग मे आपको नियम सिखाये जा सकते हैं, प्रोग्राम के उदाहरण दिये जा सकते हैं, आपको बेहतरीन तरीके से प्रोग्राम लिखने के तरीके के बारे मे बताया जा सकता है। इतना सब कुछ सीखने के बाद भी आप खुद को प्रोग्रामिंग का गुरु नहीं कह सकते !

क्युं? क्युंकि इतना सब कुछ सीखने के बाद भी बहुत कुछ सीखना बाकी है और जो बाकी है वो आपको सिखाया नहीं जा सकता वो आपको खुद ही सीखना होगा। प्रोग्रामिंग का गुरु कहलाने के लिये आपको प्रोग्रामिंग प्रोब्लम हल करनी होंगी। दूसरों के लिखे हुए प्रोग्राम को पढना होगा, उनको समझना होगा। दूसरों के लिखे हुए प्रोग्राम को अपने अनुसार बदलें, उनको रन, कंपाइल करें उनके परिणाम को जांचें।

अगले लेख में बताउंगा प्रोग्रामिंग सीखने के चरण। यदि आपको कुछ पूछना हो तो कमेण्ट मे लिखें, अगले लेख मे उसको भी शामिल करने का प्रयत्न करूंगा।

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